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वीर सावरकर : एक अपमानित योद्धा
15 अगस्त 2020 (14:30)

श्री विनायक दामोदर सावरकर

जन्म : 28 मई 1883

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े : 1898

विदेशी कपड़ों की आहुति कार्यक्रम : 1905

लन्दन गए : जून 1906

बन्दी बनाये गए (लन्दन) : 13 मार्च 1910

प्रथम उम्रकैद : 24 दिसम्बर 1910

द्वितीय उम्रकैद : 31 जनवरी 1911

सेलुलर जेल (काला पानी ) : 04 जुलाई 1911 - 21 मई 1921 (कुल अवधि : 10 साल )

अलीपोर और रत्नागिरी जेल : 1921 – 1924 (कुल अवधि : 2 साल )

रत्नागिरी में नजरबन्द : 06 जनवरी 1924 – 09 मई 1937 (कुल अवधि : 13 साल )

नजरबंदी से रिहाई : 10 मई 1937

श्री मोहनदास करमचन्द गाँधी

जन्म : 1869

इंग्लॅण्ड गए : 1888

ब्रिटिश सेना की तरफ से सार्जेंट मेजर के रूप में दक्षिण अफ्रीका की धरती पर खुनी बोअर युद्ध में हिस्सा लिया : 1899

प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना के लिए भारतीय युवकों का भर्ती अभियान चलाया l

भारत लौटे : 1915

प्रथम हिरासत : 10 अप्रैल 1919 - 11 अप्रैल 1919 (कुल अवधि : 1 दिन )

द्वितीय हिरासत : 10 मार्च 1922 - 5 फरवरी 1924 (कुल अवधि : 2 साल )

तृतीय हिरासत : 05 मई 1930 - 26 जनवरी 1931 (कुल अवधि : 9 महीना )

चतुर्थ हिरासत : 04 जनवरी 1932 - 08 मई 1933 (कुल अवधि : 16 महीना )

अंतिम हिरासत : 01 अगस्त 1933 - 16 अगस्त 1933 (कुल अवधि : 16 दिन )

जब अंग्रेज, जानवर (ब्रूट) कह कर भारतीयों को बुलाते तो क्रोधित होने के बजाये भारतीयों की प्रतिक्रिया होती की – “हाँ जी सर, हम वास्तव में ऐसे ही हैं इसी कारण ईश्वर की कृपा से हमें अंग्रेजों का शासन मिला l” मैं ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने के लिए समाज में सशस्त्र विद्रोह का बीज बोने के लिए प्रयासरत था l पाठक कल्पना कर सकते हैं की मेरा कार्य कितना कठिन और लगभग असंभव सा था l

मैं निराश नहीं था l हमारे युवा व्यर्थ नहीं थे l वे सभी हमारे अपने थे l परतंत्रता की कल्पना से उनका रक्त उबलता नहीं था किन्तु हम ये नहीं कह सकते थे की उनमें रक्त नहीं था l इनमें बहुत से प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे l उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बहुत ऊँची थी l उन्होंने ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में शानदार शैक्षणिक सफलता अर्जित की थी, जो की ब्रिटिश छात्रों से बहुत ऊँची थी l उनमें से कई आईसीएस और आईएमएस सर्विस के लिए भी चयनित हुए l ये सत्य है की इनके पालन – पोषण के तरीकों के कारण ही इनमें दास – मानसिकता पैदा हुई l किन्तु, दूसरा कारण ये भी था की किसी ने ऊँचे सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्यों को उनके सामने नहीं रखा l किसी ने ऊँचे मूल्यों की चुनौतियां उनके सामने नहीं रखीं l किसी ने उन्हें नहीं बताया की राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए युद्ध लड़ना कहीं ज्यादा संतोषजनक और चुनौतीपूर्ण कार्य हैं l किसी ने उन्हें नहीं सिखाया की परतंत्रता में रहना एक पाप है और ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकना हम सब का नैतिक कर्तव्य है l किसी ने उन्हें प्रकाश नहीं दिखाया l

                                                                                                                                                                                                                                                                   - - श्री विनायक दामोदर सावरकर

श्री विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक जिले के भागुर गाँव में हुआ था l इनके बड़े भाई का नाम गणेश सावरकर, छोटे भाई का नाम नारायण सावरकर और बहन का नाम नैनाबाई था l जब सावरकर मात्र 9 वर्ष के थे तभी उनकी माता श्रीमती राधाबाई का और 15 वर्ष की आयु में उनके पिता श्री दामोदरपन्त का स्वर्गवास हो गया l अल्पायु में ही माता – पिता का साया उठ जाने के कारण परिवार पर आर्थिक दबाव बहुत बढ़ गया था l किन्तु, बड़े भाई ने बड़े ही हिम्मत से परिवार के भरण – पोषण का दायित्व उठाया और सभी ने अपनी कर्मठता से उच्च शिक्षा प्राप्त की l

विपरीत परिस्थितियों के बाद भी सावरकर परिवार भी स्वयं को स्वतंत्रता संग्राम से दूर नही रख सका और वीर सावरकर ने मात्र 15 साल की आयु में अपनी कुलदेवी के सामने ब्रिटिश राज के खिलाफ सशत्र विद्रोह की शपथ ली और ब्रिटिश राज के खिलाफ संग्राम में कूद पड़े l 17 साल की आयु में सन 1900 में सावरकर ने स्थानीय स्तर पर ‘मित्र मेला’ नामक एक क्रांतिकारी संस्था का गठन किया और चार साल के अथक परिश्रम से 1904 में 21 वर्ष को आयु में उन्होंने ‘अभिनव भारत’ नामक व्यापक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की l

22 वर्ष की आयु में सन 1905 में पहली बार वीर सावरकर ने ही पुणे में विदेशी कपड़ों की आहुति देने का कार्यक्रम रखा था किन्तु त्रासदी ये रही की इस कृतघ्न राष्ट्र ने विदेशी कपड़ों की आहुति के कार्यक्रम का श्रेय उसको दिया जिसे 1915 तक इसबात का आभास भी नहीं था की उसका राष्ट्र परतंत्रता का दंश झेल रहा है l

जून 1906 को 23 वर्ष की आयु में सावरकर उच्च शिक्षा के लिए लन्दन चले गए किन्तु ह्रदय में जल रही स्वतंत्रता की अग्नि ने उन्हें इंग्लॅण्ड में भी चैन से रहने न दिया l एक साल बाद, 24 वर्ष की आयु में 10 मई 1907 को सावरकर ने लन्दन में अंग्रेजों की धरती पर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन किया l लन्दन में पढाई के दौरान उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं l मई 1909 में उन्होंने अपनी कानून की पढाई पूरी की किन्तु उनके वकालत करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया l इसी समय 01 जुलाई 1909 को श्री मदनलाल धींगरा ने लन्दन में कर्ज़न वायिली का वध कर दिया l

श्री मदनलाल धींगरा, लन्दन में एक भारतीय छात्र l इनका भी लन्दन के ‘इंडिया हाउस’ में नित्य आना जाना था जहां सभी राष्ट्रवादी छात्र भारत की स्वतंत्रता के प्रयासों के लिए इक्कठे हुआ करते थे l इंडिया हाउस में आने वाले छात्रों में भी एक ‘फ्री इंडिया सोसाइटी’ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन था जिसके नेता थे – श्री विनायक दामोदर सावरकर l श्री धींगरा भी इस संस्था के सदस्य थे और श्री सावरकर को अपना आदर्श मानते थे l श्री धींगरा के शौर्य से लज्जित अंग्रेजों के चाटुकार भारतीयों ने निंदा प्रस्ताव पारित करने की एक सभा रखी जिसमें श्री धींगरा के भाई भी सम्मिलित हुए l सभा के चेयरमैन आगा खान (मुस्लिम लीग के संस्थापक) ने प्रस्ताव पारित करते हुए कहा – “ ये सभा मदनलाल धींगरा की एकमत से निंदा करती है ” l तभी एक स्वर गूंजता है – ‘नहीं ! एकमत से नहीं ‘ l आगा खान ने क्रोध से पूछा – “ कौन नहीं कह रहा है ? स्वर गूंजता है – ‘मैं नहीं कह रहा हूँ ‘ l आगा खान ने पूछ – “ अपना नाम बताएं ” l इतने में चाटुकार भारतीयों का धैर्य समाप्त हो जाता है और वे चीखने लगते हैं की इसे बिठाओ, इसे बाहर फेंको l तभी पुनः स्वर गूंजता है – ‘ ये मैं हूँ ! मेरा नाम है सावरकर ! ‘ l  एक – दो अंग्रेज हाथापाई के लिए आगे बढ़ते हैं और अधिकतर घबरा कर कुर्सियों और मेजों के नीचे छिप जाते हैं l हंगामा होता है और प्रस्ताव पारित किये बिना सभा समाप्त हो जाती है l

इसी बीच, 11 जून 1909 को बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर को उम्रकैद (कालापानी) और सारी संपत्ति जप्त की सजा हो जाती है l

17 अगस्त 1909 को श्री धींगरा को फंसी दे दी जाती है l

13 मार्च 1910 को सावरकर को लन्दन में बंदी बना लिया जाता है और आगे की कार्यवाही के लिए भारत भेजा जाता है l रास्ते में वह प्रसिद्द घटना होती है जब जहाज फ्रांस के मार्सिले के निकट पहुँचता है तभी जहाज के एक छेद से समुद्र में छलांग लगाकर सावरकर तैर कर मार्सिले पहुँच जाते हैं जहां ब्रिटिश आधिकारी उन्हें पुनः बंदी बना लेते हैं l सावरकर भारत लाये जाते हैं जहां उनपर मुकदमा चलता है l नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या में सहयोग और राजद्रोह के शौर्य के लिए सावरकर को दो उम्रकैद, अर्थात 50 वर्ष, की सजा होती है और उन्हें 04 जुलाई 1911 को अंडमान के सेलुलर (कालापानी) जेल भेज दिया जाता है जहां उनके बड़े भाई पहले से ही बंद थे l अंग्रेज सरकार ने सावरकर को राजनैतिक बंदी की श्रेणी में रखने से इनकार कर दिया l

जेल में उन्हें नारियल की जटाओं से तेल निकालने का कार्य दिया गया l उस तेल मिल के बारे में कहा जाता है की उसके चक्के को मात्र बीस चक्कर घुमाने में ही अच्छे से अच्छे कद – काठी का व्यक्ति भी धराशायी हो जाता था l सावरकर जैसे कमजोर – शरीर के व्यक्ति का ये नित्य कर्म था l इसके अतिरिक्त, गन्दा खाना और पानी दिया जाता l कुल मिलाकर यातना की चरम सीमा को सावरकर ने पूरे दस साल तक झेला था l

सावरकर एक चरम राष्ट्रवादी थे जो हमेशा कर्म में विश्वास रखते थे और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत मान – अपमान से बहुत ऊपर रखते थे l छत्रपति शिवाजी महाराज उनके आदर्श थे और उन्ही की तरह गोरिल्ला तकनीकी का समयानुसार उपयोग भी करते थे l कालापानी के दौरान सैकड़ों राजनैतिक बंदियों के बारे में सावरकर को पता चला और समझ आ गया की सामान्य तौर – तरीकों से इस चाहरदीवारी के बाहर इन सब का जीवित निकल कर जा पाना संभव नहीं है और वीरगति को प्राप्त होकर राष्ट्र को स्वतंत्र नहीं कराया जा सकता l  अतः वो जेल से बाहर निकलने की युक्ति खोजने लगे l व्यवसाय से बैरिस्टर होने के कारण उन्होंने कानूनी दांव – पेंच और राजनैतिक बंदियों को मिलने वाले अधिकारों का सहारा लेने की सोची और सभी राजनैतिक बंदियों की रिहाई के लिए कई पत्र लिखे जिसे क़ानून की भाषा में ‘माफीनामा’ कहा जाता था l सावरकर ने कभी भी अपनी व्यक्तिगत रिहाई के लिए कोई भी ‘माफीनामा’ कभी नहीं लिखा जैसा की उनके विरुद्ध काले अंग्रेजों द्वारा दुष्प्रचार किया जाता है l सावरकर ने अपने माफीनामे के प्रयासों पर कहा था कि – “मैं बिना अपनी व्यक्तिगत रिहाई की चाहत के ये कर रहा हूँ l अगर मुझे अंडमान की काल कोठरी में अकेला छोड़ कर सभी राजनैतिक बंदी रिहा कर दिए जाते हैं, तो, मैं उनकी स्वतंत्रता में वैसे ही आनंदित होऊंगा जैसे की ये मुझे मिली हो”l ये था सावरकर का निःस्वार्थ राष्ट्रसेवा का भाव जिसे कृतघ्न राष्ट्र ने हर क्षण अपमानित किया l

दस साल बाद 1921 से 1923 तक सावरकर को अलीपोर और रत्नागिरी के जेल में रखा जाता है l 06 जनवरी 1924 को सावरकर सशर्त रिहा होते हैं l शर्त होती है – कोई राजनैतिक गतिविधि नहीं होगी, वकालत और लेखन का कार्य भी नहीं करेंगे और रत्नागिरी से बाहर नहीं जायेंगे l अर्थात्, रत्नागिरी में नज़रबंद l चूंकि वकालत और लेखन पर पाबंदी थी इसलिए सावरकर को ब्रिटिश सरकार की तरफ से एक छोटी रकम हर महीने जीवन – यापन के लिए मिला करती थी l इस रकम का भी काले अंग्रेजों ने जमकर सावरकर के चरित्रहनन के लिए प्रयोग किया l असल में ये रकम भी नज़रबंदी की सजा का ही हिस्सा थी l नज़रबंदी के इस लम्बे कालखंड में भी सावरकर शांत नहीं रहे बल्कि अनेकों महत्वपूर्ण कार्य किये l कुछ इस प्रकार हैं –

इस कालखंड में सावरकर ने समाज सुधार पर भी काफी जोर दिया l अपने समाज सुधार अभियान के तहत सावरकर ने 1930 में अस्पृश्यता के विरोध में सभी जातियों के ‘सहभोज’ का सफल आयोजन किया l मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर पाबंदी के विरोध में ‘पतितपावन मंदिर’ की स्थापना की जो सभी हिन्दुओं के लिए खुला हो और जाति के नाम पर भेदभाव न हो l 1931 में पतितपावन मंदिर के प्रांगण में ‘सोमवंशी महार परिषद्’ के चेयरमैन बने l भंगी समाज के व्यक्ति द्वारा अनेकों कीर्तन के कार्यक्रमों का आयोजन किया l सबसे ख़ास बात ये रही की, सावरकर ने अपने राष्ट्र अथवा समाज हित के कार्यों का कोई राजनैतिक मूल्य लेने का कभी कोई प्रयास नहीं किया l

अंततः, 10 मई 1937 को सावरकर बिना किसी शर्त के नज़रबंदी से मुक्त कर दिए गए l

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के आरम्भ से बहुत पहले ही सावरकर ने हिन्दुओं से अपील की थी की वे ब्रिटिश इंडिया आर्मी में भर्ती हो जायें l इस अपील के पीछे दो कारण थे – पहला, ब्रिटिश राज को सीधी सैन्य चुनौती द्वारा उखाड़ पेंकने के लिए सैन्य प्रशिक्षण की आवश्यकता थी जो केवल सेना में ही मिल सकती थी l दूसरा, हिन्दुओं की तुलना में मुसलमान बहुत संख्या में सेना में भर्ती हो कर सैन्य प्रशिक्षण ले रहे थे जो एक खतरनाक स्थिति थी क्योंकि वे अंग्रेजों के बाद एकबार फिर भारत में इस्लामी शासन के लिए प्रयासरत थे, न की, भारत की स्वतंत्रता के लिए l सावरकर सही साबित हुए क्योंकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आईएनए में शुरू में अलग – अलग क्षेत्रों के नागरिक स्वयंसेवक थे जिससे बाद में ब्रिटिश इंडिया के सैनिक जुड़ गए और ब्रिटिश इंडिया को सीधी सैनिक चुनौती दी जो अंग्रेजों के भारत छोड़ने का मुख्य कारण बनी l

अगर ब्रिटिश राज में सावरकर को यातनाएं मिली जोकि अपेक्षित थी तो स्वतंत्र भारत के कांग्रेस राज में भी उन्हें उपेक्षा और अपमान कम नहीं मिला l एम के गाँधी की हत्या में आरोपी बनाकर जेल में डाला गया, बाद में ससम्मान रिहा हुए l 04 अप्रैल 1950 को पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री लियाकत अली खान के दिल्ली आगमन के एक दिन पहले सावरकर को बेलगाम में जेल में डाल दिया गया . . . . यह अत्यधिक अपमानजनक था l इसीतरह स्वतंत्र भारत में 19 साल तक गुमनामी और अपमान का सफ़र तय करते हुए सावरकर ने 26 फरवरी 1966 को अपने प्राण त्याग कर स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर दिया और पीछे छोड़ गए एक शापित भूमि जिसने सच्चे बलिदानियों के अपमान और तिरस्कार से कुपित होकर राष्ट्रवादी पैदा करना बंद कर दिया l

एकबार किसी ‘मंदबुद्धि’ ने चीख कर कहा था – "मैं सावरकर नहीं . . . ,  ***  हूँ" l उस मंदबुद्धि को मात्र इतना ही कहना है की वर्णसंकरों के खून में इतनी गर्मी नहीं होती की सावरकर पैदा कर सके l व्यभिचार की संस्कृति से राष्ट्रद्रोही पैदा होते है राष्ट्रवादी नहीं l

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जिस व्यक्ति ने राष्ट्र के लिए दस साल कालापानी और पंद्रह साल कारावास और नज़रबंदी को झेला हो, उसे एक सामान्य अभियुक्त की तरह हत्या के आरोप में न्यायालय के बेंच पर बिठा कर रखना, क्या राष्ट्र के लिए सम्मान की बात थी ?

गाँधी के साथ नाखून कटाने वाले, स्वतंत्रता सेनानी कहलाये और जीवन भर सरकारी सुविधाओं का भोग किया और जीवन की आहुति देने वाले अभियुक्त और युद्ध अपराधी कहलाये ?

ये हम सब को सोचना चाहिए l  

सावरकर ने अपने मृत्यु के कुछ दिन पहले से ही अन्न – जल त्याग दिया था l क्या सोचते रहे होंगे सावरकर इन थोड़े दिनों में ? मां भारती स्वतंत्र तो हो गईं किन्तु खंडित ? जिस राजनैतिक – सामजिक गठजोड़ ने भारत के टुकड़े किये उन्ही का सत्ता से लेकर समाज तक में प्रभुत्व हो गया ? स्वतंत्रता की इस लडाई में क्या खोया क्या पाया ? पहले गोरे अंग्रेज थे और अब काले अंग्रेज ? परतंत्रता में क्या समस्या थी, यही न, की आदमी का स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रहता ? फिर राष्ट्र पर पूरा जीवन न्यौछावर कर देने के बाद भी मेरा मान, सम्मान और स्वाभिमान स्वतंत्र भारत में सुरक्षित क्यों न रह सका ? अंग्रेजी शासन में 25 साल तक यातनाएं सही और स्वतंत्र भारत में 19 साल तक तिरस्कार और अपमान l पराये लोगों द्वारा दी गयी यातना से ज्यादा कष्टकर अपनों द्वारा किया गया अपमान होता है l शायद यही सब सोचते रहे होंगे . . . . . वीर सावरकर l

पीड़ा होती है देख कर की भारत का सुविधाभोगी समाज मुंह उठाकर सावरकर के शौर्य और बलिदान पर पूरी निर्लज्जता से प्रश्नचिन्ह लगा देता है l ये वो लोग हैं जो कोरोना महामारी के कारण भी अपने घर के अन्दर 21 दिन के लॉक डाउन का पालन न कर सके, इन लोगों को मात्र 7 दिन उसी काल कोठारी में रख दिया जाये तो भय से आत्महत्या कर लेंगे l किन्तु एक बात सही है की, जिस समाज ने वहशी मुग़लों को अपना आदर्श बना लिया हो, जिस समाज ने हिंसक अंग्रेजों को भारत को सभ्य और विकसित बनाने का श्रेय दे दिया हो, जिस समाज ने अंग्रेजों के चाटुकारों को भारत भाग्य विधाता घोषित कर दिया हो, वो समाज और राष्ट्र, सावरकर के स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर पायेगा l सावरकर के स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए स्वयं सावरकर बनना पड़ता है, स्वयं सावरकर बनने के लिए बहुत से कष्ट उठाने पड़ते हैं क्योंकि सावरकर का अर्थ है – ‘राष्ट्र – पुरुष’ l

हम जिन लोगों को अपना आदर्श बनाते हैं, समय के साथ इन आदर्शों का मूल चरित्र, समाज और राष्ट्र का मूल चरित्र बन जाता है और यही हमारा भविष्य भी निर्धारित करता है l 

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